“मीडियासुर” – क्या है भ्रष्ट मीडिया का असली चेहरा?

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संजीब ब्रह्मा : भारतीय मीडिया पक्षपात से भरी है

सूचनाओं और खबरों के जरिए आज दुनिया को संचालित किया जाता है

खबरें सरकार बनाती और गिराती हैं.

अभी पिछले कुछ दशकों में ही खबरों के ज़रिए हमने राष्ट्रों और सभ्यताओं को नष्ट होते देखा है.

भारत एक लोकतांत्रिक देश है और लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तंभों में मीडिया भी एक प्रमुख स्तंभ है. लोकतंत्र के बाकी तीन प्रणालियों की खबर जनता तक पहुंचाना, और जनता की आवाज लोकतांत्रिक सरकार तक पहुंचाना मीडिया का काम है.

आदर्श स्वरुप में मीडिया को कोई पक्ष नहीं लेना चाहिए. सूचना को सिर्फ तथ्यों के रूप में जनता तक पहुंचाना चाहिए. इन सूचनाओं और तथ्यों के जरिए जनता को अपना पक्ष खुद तय करना चाहिए.

यह तो हुई आदर्शवादी बात, किंतु सच्चाई यह है कि मीडिया अपनी ताकत अच्छी तरह से जानता है, और खबरें जनता तक बिना किसी प्रयोजन के पहुंचाई नहीं जाती हैं.

अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के बड़े खिलाड़ी अभी भी खुद को उच्च, विशिष्ट और शासक मानने वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकाल पाए हैं. वो आज भी दुनिया में भारत कि छवि संपेरों वाले पिछड़े देश के रुप में दिखाते हैं.
‘द न्यू यार्क टाइम्स’ में इसरो के मार्स मिशन को दिखाने के लिए गाय लिए एक किसान का कार्टून हो या फिर बीबीसी का भारत को सपेरों का देश बताना, यह सब उनकी इसी शासक वाली मानसिकता के जुगाली के उदाहरण हैं.

पश्चिमी दुनिया को चलाने वाली शक्तियों में धर्म व्यवसाय एवं राजनीति प्रमुख हैं. इन्हीं तीनों में से किसी शक्ति का निहित स्वार्थ साधने के लिए पश्चिमी अंतर्राष्ट्रीय मीडिया भारत की संस्कृति, इतिहास और वर्तमान परिस्थिति को नकारात्मक प्रकाश में पेश करती है.

भारत का अपना हिंदी और इंग्लिश राष्ट्रीय मीडिया भी किसी भी तरह से निरपेक्ष नहीं है. मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा भाग संस्कृति विरोधी है, भारत का प्राचीन इतिहास और संस्कृति जिन भी चीजों को अपना गौरव मानते हैं, उनको यह मीडिया या तो नकारात्मक प्रकाश में दिखाता है या फिर भारत के प्राचीन सांस्कृतिक इतिहास का अस्तित्व ही सिरे से खारिज कर देता है.

लेफ्ट (वाम) और राइट(दक्षिण) विंग मीडिया की परंपरा दुनिया के लगभग सभी स्वतंत्र देशों में मिलती है. भारत में भी आसानी से लेफ्ट और राइट मीडिया की पहचान की जा सकती है.
अन्य देशों में जहां पर स्वतंत्र मीडिया है वहां राइट विंग मुख्यतः क्रिश्चियन धर्म मानने वालों का होता है. लेफ्ट विंग सीधे तौर पर क्रिश्चियनिटी की परंपराओं और इतिहास पर अपने तर्क और विज्ञान के जारिए हमला करता है. इसी तर्ज पर भारत में लेफ्ट विंग का मीडिया, यहां की प्राचीन सनातन संस्कृति या हिंदू धर्म के विरोध में खड़ा होता है.

पहले तलवार के दम पर दुनिया बदली जाती थी. तलवार से तो भारत की संस्कृति को ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पड़ा, परंतु पश्चिमी विचारकों ने जबसे विचारों के जरिए लोगों को और दुनिया को बदलने में महारत हासिल की, तब से भारतीय संस्कृति के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हुआ है. जो काम तलवारों के जरिए सदियों पहले आक्रमणकारी नहीं कर पाए, वह काम आज हम खुद ही कर डालने पर उतारू आ गए हैं.

आज भारतीय लोग अपनी संस्कृति और इतिहास को लेकर हीन भावना से ग्रस्त हैं और मुख्यतः अपने धर्म और संस्कृति से किसी तरह के जुडाव को अपनी कमजोरी की तरह छुपाते हैं. हीनता की यह शुरुआत कैसे होती है और मीडिया का इस सब में क्या रोल है, यह आसानी से मनोविज्ञान के जरिए समझाया जा सकता है.

वस्तुतः मनोविज्ञान का इस्तेमाल मीडिया में खूब हो रहा है. अपना एजेंडा लोगों के जेहन में उतारने के लिए मनोविज्ञान का उपयोग इस तरह किया जाता है, कि इससे पहले लोग समझ पाएं, कि विचार उनकी जीवनशैली लिए नुकसानदायक है, वह अनजाने में ही उस विचार के समर्थक हो जाते हैं. इस मनोविज्ञान का प्रभाव ही ऐसा है कि आप शिकार हो जाते हैं, और आपको पता भी नही चलता.

किसी संस्कृति को नष्ट करना है तो उसके आधार स्तंभों को नष्ट करना होता है. किसी धर्म को नष्ट करने के लिए , उसके धर्म प्रमुखों, धर्म गुरुओं को और धार्मिक आचरण करने वाले लोगों की छवि खराब करना सबसे आसान तरीका होता है.

उदाहरण के लिए आपके सामने किसी धार्मिक व्यक्ति को पुकारने के लिए आज यदि ‘बाबा’ शब्द का इस्तेमाल किया जाए तो ‘बाबा’ शब्द सुनते ही आपके मन में कुछ नकारात्मक शब्द ज़रूर आएंगे. ऐसा कैसे हुआ यह मनोविज्ञान के जरिए समझा जा सकता है. मनोविज्ञान कहता है किसी विचार को बदनाम करना है तो उसे आपको एक गंदी चीज के साथ जोड़ना चाहिए, भले ही उनका आपस में कोई स्पष्ट संबंध ना हो. फिर उस बात को बार बार दोहराते जाना होता है.

इस सूत्र का सफल इस्तेमाल आज की मीडया ने किया है इसलिए ‘बाबा’ शब्द बोलते ही ‘फर्ज़ी बाबा’ या ‘रेपिस्ट बाबा’ जैसे नकारात्मक शब्द अनायास ही आपके दिमाग में पैदा हो जाते हैं. इस तरह से पिता, बुजुर्ग ,अनुभवी और महात्मा जैसे भाव बताने वाला सुन्दर ‘बाबा’ जैसा शब्द लोगों के बीच बेहद नकारात्मक बना दिया जाता है.

विज्ञापन बनाने वाली कंपनियां मनोविज्ञान के इस सूत्र का उपयोग अपना सामान बेचने के लिए और ब्रांड बिल्डिंग में करते हैं. विज्ञापन के जरिए जिस ब्रांड का प्रमोशन करना होता है, उस ब्रांड का नाम लेते ही आपके दिमाग में कोई खुशी, प्यार या किसी तरह की खास सकारात्मक भावना पैदा करने की कोशिश की जाती है. कोशिश होती है ग्राहक का ब्रांड के साथ रिश्ता बने. ब्रांड अपने नाम के साथ स्लोगन का उपयोग जनता तक अपनी छवि पहुचने के लिए और रिश्ता बनाने की लिए करते हैं.

गलत चीजों के खिलाफ आवाज उठाना लोकतंत्र में सबका अधिकार है. आज भारत की जनता को हमेशा सावधान रहने की जरूरत है, कि कहीं किसी मुद्दे की आड़ लेकर, किसी विचार को गलत बता कर, उन्हें उनकी संस्कृति के खिलाफ भड़काया तो नहीं जा रहा है.

सदियों की लंबी गुलामी में हम भारतीय लोग हीन मानसिकता के शिकार हो चुके हैं. कोई हमारी परम्पराओं को पिछड़ी मानसिकता कह दे तो हम परंपरा से अपना जुडाव छुपाने लगते हैं. हमने बहुत सारी उच्च विचारों से भरी परम्पराओं को छोड़ दिया और अनेक नकारात्मक और हानिकारक विचारों से भरी पश्चिमी जीवनशैली को सिर्फ इसलिए अपना लिया कि “पश्चिमी गोरे लोग ऐसा करते हैं तो सही ही होगा”.

भारतीय मीडिया का बड़ा हिस्सा भारतीय संस्कृति के इस हद तक खिलाफ है, कि अगर किसी विचार से भारत को एक राष्ट्र के रूप में हानि हो, किंतु उस खबर से उनका हित सधे, तो वह उसे एक सच्ची खबर कह कर, पूरी दुनिया के सामने रख देंगे. इस स्थिति में मीडिया की बोलने की स्वतंत्रता (राइट टू स्पीक) राष्ट्रविरोधी और राष्ट्रद्रोह की सीमा तक पहुँच जाती है.

जिन लोगों में संस्कृति और राष्ट्र ले लिए सम्मान नहीं है, उनके प्रति भारतीय जनता को सावधान रहने की जरूरत है. लेफ्ट विंग मीडिया जो समाजवाद और कम्युनिस्ट जैसी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करता है, वह संस्कृति विरोधी कार्य अपनी विचारधारा को समाज में क्रियान्वित करने के लिए करता है. कम्युनिस्ट जैसी विचारधाराएं पूरी तरह से नास्तिक हैं, और कम्युनिस्ट विचार को क्रियान्वित करने का एक प्रमुख स्टेप पुरानी संस्कृति और धर्म को नष्ट करने से शुरू होता है. ताकि सरकार और जनता नास्तिक हो जाय और केवल तर्क के आधार पर समाज की स्थापना हो. यदि भारत की जनता को अपनी संस्कृति और धर्म से प्रेम है और उन्हें लगता है कि उनकी संस्कृति में वह तत्व है जो संरक्षण योग्य है, तो उन्हें हमेशा इस मीडिया से सावधान रहने की जरूरत है.
आजकल मीडिया के ज़रिए भारतीय संस्कृति को तोड़ने की कोशिश में केवल नास्तिक लोग ही नहीं, बल्कि बाहरी अन्य धर्मों के लोग भी हैं.

आज हमारे विचार, संस्कृति और धर्म को तलवारों और बंदूकों से कम खतरा है, किंतु मीडिया द्वारा प्रसारित विचारों के प्रति हमें ज्यादा चौकन्ना रहने की जरूरत है. हमें इन घातक विचारों से अपनी रक्षा करने में कुशल होने की जरूरत है .

किसी संस्कृति की मूल विचारधारा में प्रहार करके उस पूरी संस्कृति और समाज को नष्ट कर देने में, आज पश्चिमी दुनिया बहुत कुशल हो गई है. उनके पास समाज, विचारधारा और धर्म को नष्ट करने का हजारों साल का अनुभव अब हो चुका है. ग्रीक और रोम की प्राचीन सभ्यता वाले देवताओं के साथ जर्मनी की वाइकिंग्स सभ्यता के देवताओं को पूजने वाला आज कोई नहीं बचा.

मीडिया प्रायोजित है, और वह अपनी चाहे जो भी कोशिशें करें उसका प्रभाव जनता पर नहीं होना चाहिए. यदि मीडिया निरपेक्ष नहीं है तो खबर सुनने वालों के पास विवेक की छलनी होनी चाहिए, ताकि क्या सुनना है और क्या नहीं इसका फैसला श्रोता और दर्शक खुद कर सकें.

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