मैं अपनी प्यारी ‘आरू’ को नहीं बचा पाया : राजेश तलवार की जेल में लिखी डायरी के कुछ हिस्से

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आरुषि तलवार और घरेलू नौकर हेमराज की हत्या का मामला भारत की चुनिंदा पेचीदा पहेलियों में से एक माना जाता रहा है। पास के कमरे में माता-पिता सोते रह गए और आरुषि की हत्या हो गई। वर्ष 2013 में उत्तर प्रदेश की एक कोर्ट ने डेंटिस्ट दंपति राजेश और नूपुर तलवार को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी। दोनों ही नोएडा स्थित अपने घर में अपनी 13 साल की बेटी और घरेलू नौकर हेमराज की हत्या के दोषी करार दिए गए। गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया है।

पत्रकार अविरूक सेन द्वारा लिखी गई किताब ‘आरुषि’ के मुताबिक, अविरूक की जांच से भी साबित हुआ था कि तलवार दंपति बेकसूर हैं।

‘आरुषि’ में राजेश तलवार की उस डायरी के कुछ अंश हैं, जिसे उन्होंने 25 नवंबर, 2013 को उस दिन से जेल में लिखना शुरू किया था, जिस दिन अदालत ने उन्हें और नूपुर को दोषी करार दिया था। पढ़िए डायरी के कुछ हिस्से (जो अविरूक सेन की किताब ‘आरुषि’ का हिस्सा हैं, और उन्हें पेंग्विन बुक्स इंडिया की अनुमति से यहां प्रकाशित किया जा रहा है)

27 नवंबर, 2013: दोपहर 1 बजे मैं नूपुर से मिला। वह बहुत ही थकी हुई सी लग रही थी। किसी अपने से मिलना चाहती थी, उसे अपने डैड की चिंता हो रही थी, लेकिन वह बहुत ही दूर हैं, रोज़ तो नहीं आ सकते न…? मुझे पता है, हम दोनों अगर वहां गए तो कम लोग आने लगेंगे, शायद हफ्ते में एकाध बार। शायद हम कल किसी से एक साथ मिल पाएं। बाहर कुछ बातें बड़ी ही ग्रांटेड ले ली जाती हैं। मैं किसी अपने से मिलना चाहता हूं, लेकिन नहीं मिल सकता। अभी तो तीन ही दिन हुए हैं।

29 नवंबर, 2013: जेल सुपरिन्टेन्डेन्ट से नूपुर और अपने बारे में कुछ बात करनी थी। उसने बताया कि मीडिया सवाल कर रहा है कि हमें आगरा की जेल में क्यों नहीं भेजा जा रहा। यह सुनकर मैं शॉक हो गया। अगर ऐसा हुआ तो हमारा क्या होगा। ख़ैर, हमने अर्जी दे दी है, उम्मीद है, ऐसा कुछ न हो।

3 दिसंबर, 2013: पता नहीं, हमारे साथ यह सब कुछ कैसे हो गया…? अगर मेरी नींद खुल जाती तो मैं अपनी आरू को बचा लेता। उसके बग़ैर कैसे जीऊंगा…?

5 दिसंबर, 2013: एक-दो दिन में मेरा डेंटल क्लीनिक शुरू हो जाना चाहिए, लेकिन नूपुर के लिए कुछ नहीं है। उसका वक्त कैसे बीतेगा…?

8 दिसंबर, 2013: आज नूपुर से मिलने की कोशिश करूंगा। पता नहीं, अपील का क्या हुआ। क्या हो रहा है, कुछ पता ही नहीं चलता, ऊपर से यह सब कुछ कब तक चलेगा, कुछ पता नहीं। आरू की और हमारे उन अच्छे दिनों की बहुत याद आती है। लोग अपने बच्चों की बातें करते हैं। बच्चे उनसे जेल में मिलने भी आते हैं, लेकिन हमारे साथ ऐसा कुछ नहीं है।

12 दिसंबर, 2013: अस्पताल होकर आया हूं… सब कुछ चेक कर लिया। कानून मंत्री से मिलना हुआ, क्योंकि डिप्टी जेलर ने मुझे वहां बुलाया था। ऐसा लगता है, चिड़ियाघर का कोई जानवर हूं, जिसे देखने सब आते रहते हैं।

18 दिसंबर, 2013: 19 जनवरी को हमारी शादी के 25 साल पूरे हो जाएंगे। किसने सोचा था कि पच्चीसवें साल में हम यहां होंगे…? न आरू है, न घर है, न क्लीनिक, न पैसा, बस जेल में उस जुर्म की सज़ा काट रहे हैं, जो हमने नहीं किया।

19 दिसंबर, 2013: बस, सोचता रहता हूं कि अगर वह हादसा न हुआ होता तो अभी हम कहां होते। आरू की याद बहुत आती है। पता नहीं, कहां होगी और हमें इस हालत में देखकर क्या सोच रही होगी। खुद को बेक़सूर साबित करने का कोई तरीका नहीं है। कोई भी कुछ भी साबित नहीं कर पाया, लेकिन बस, हमारे जवाब से कोई संतुष्ट नहीं था।

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