नेपाल यात्रा के पड़ाव पर आज प्रिया ईशपुत्र पोखरा पहुंचे

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काठमाण्डु

सुबह 8 बजे काठमाण्डु के ‘त्रिभुवन एयरपोर्ट’ से ‘कौलान्तक पीठ’ के ‘पीठाधीश्वर’ ‘महायोगी सत्येंद्र नाथ’ (ईशपुत्र) पोखरा के लिए निकले। उनके साथ ‘माँ प्रिया भैरवी’ विष्णु भैरव और लीलाकान्त भैरव साथ थे। ‘येति एयरलाइन्स’ से सभी ने उड़ान भरी। ‘त्रिभुवन एयरपोर्ट’ पर ‘प्रिया-ईशपुत्र’ विदेशी पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहे। लोग एयरपोर्ट पर ‘प्रिया-ईशपुत्र’ के साथ फोटो लेने की होड़ में जुटे दिखे। ‘त्रिभुवन एयरपोर्ट’ पर ‘प्रिया-ईशपुत्र’ की बहुत सी तस्वीरें ली गई। लगभग आधे घंटे की उड़ान के बाद विमान से ‘प्रिया-ईशपुत्र’ ‘पोखरा एयरपोर्ट’ पहुंचे। यहाँ भी विदेशी पर्यटक उनकी तस्वीरें उतारने में जुटे दिखे। ‘ईशपुत्र’ ने ‘पोखरा’ को एक स्वच्छ और सुन्दर शहर कहा। उनहोंने कहा कि यहाँ आ कर उन्हें बहुत अच्छा महसूस हो रहा है। ‘माँ प्रिया भैरवी’ ने ‘पोखरा’ के बारे में कहा कि ये प्रकृति के बीच मोती की तरह बसा सुन्दर शहर है और लोगों को जरूर इसे देखना चाहिए। ‘ईशपुत्र’ ने कहा कि विमान से ‘नेपाल’ के ‘हिमालयों’ को देखना सबसे सुन्दर अनुभव है और नीचे पानी की मनमोहक झील भी आकर्षित करती है। उनहोंने कहा कि जल्द ही वो ‘हिमालय’ के निकट होंगे।

 

‘प्रिया-ईशपुत्र’ विष्णु भैरव और लीलाकान्त भैरव पोखरा के ‘शांगरी ला विलेज’ में ठहरे हैं। पोखरा आने पर ‘प्रीया-ईशपुत्र’ ने स्थानीय पर्यटन स्थलों को भी देखा। सबसे पहले उनहोंने ‘गुप्तेश्वर महादेव’ के दर्शन किये और प्रसिद्द ‘डेविस फॉल’ देखा। पोखरा घूमते हुए ‘प्रिया-ईशपुत्र’ ‘महेंद्र गुफा’ और ‘चमेरे गुफा’ को देखने भी गए। ‘सेती नदी दर्शन’ यहाँ का एक प्रमुख आकर्षण है। देर शाम उनहोंने ‘फेवा ताल’ की ओर रुख किया और ‘लेक साइट’ जा कर ‘नेपाली संस्कृति’ की झलक भी देखी। जहा उनहोंने ‘नेपाली’ व्यंजनों का आनंद लिया। पहली बार ‘प्रिया-ईशपुत्र’ विश्राम के मूड में नज़र आये। पोखरा में भी लोग ‘प्रिया-ईशपुत्र’ में उत्सुक दिखे। ‘ईशपुत्र’ ने कहा कि हमें पूरी दुनिया में आज मानवीय मूल्यों की आवश्यकता है। मनुष्य उन्नति तो कर रहा है लेकिन प्रेम और मानवता नष्ट होती जा रही है। उनहोंने ‘बुद्ध पूर्णिमा’ के अवसर पर सभी को बधाई दी और सभी को बुद्ध के मूल्यों और आदर्शों को अपनाने को कहा। ‘ईशपुत्र’ बोले कि दुनिया को ‘सिद्धों और बुद्धों’ की ज्यादा जरूरत है। संकीर्णताएं बढ़ रही हैं और उन्माद भी। ऐसे में ज्ञान और ध्यान ही सहारा है। उनहोंने कहा कि ‘कौलान्तक पीठ’ नेपाल की अपनी पीठ है इसलिए किसी को भी ‘कौलान्तक पीठ’ से जुड़ने में कोई संकोच करने की आवश्यकता नहीं है। उनहोंने कला संस्कृति संरक्षण के साथ ही पर्यावरण और स्वास्थय का सन्देश भी दिया।

 

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